मेरी अनुमति के बिना इस ब्‍लाग की किसी भी सामग्री का किसी भी रूप में उपयोग करना मना है । ........ देव कान्‍त पाण्‍डेय

शनिवार, 13 जुलाई 2013

गजल

बातों बातों में ही कुछ बात निकल जाती है 

नासाज तबीयत भी मुस्‍का के मचल जाती है । 
गर हो जाए जरा सी भी खुदा की रहमत 
चंद लम्‍हों में भी तकदीर बदल जाती है ।




आज के दौर में फितरत है ये सियासत की 

 रूह को कत्‍ल कर जज्‍बों को निगल जाती है ।
 बहुत पहले ही कह गए ये खुदा के बंदे 
 जिंदगी रेत है मुट्ठी से फिसल जाती है ।
 मेरे महबूब की चाहत का है ये कैसा असर
 शाम होते ही शमां याद की जल जाती है ।
 बिता के साथ में उनके हसीन कुछ घड़ि‍यां
 धूप जीवन की मेरे बर्फ सी गल जाती है ।
 बुझी-बुझी सी अब रंगत हुई है खेतों की
 शहर की आग यूं गांवों को निगल जाती है ।  
 समां क्‍यूं हो गया ऐसा है देव दुनिया का
 शजर की छांव अब सरसर* से दहल जाती है ।  
                        ...... देवकान्‍त पाण्‍डेय
*गर्म हवा के झोंके