मेरी अनुमति के बिना इस ब्‍लाग की किसी भी सामग्री का किसी भी रूप में उपयोग करना मना है । ........ देव कान्‍त पाण्‍डेय

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2008

त्रासदी

है हो रहा हिंसा का नंगा नाच सारे देश में,
हैं आततायी फ़िर रहे बेखौफ ढेरों वेश में,
रक्षक हमारे तान कर बन्दूक केवल हैं खड़े,
शासक हमारे अब भी हैं चिर नींद में सोये पड़े,
ये मौत कोई ना मरे यह सोचता ही कौन है,
इस प्रश्न पर तो देश की संसद भी अपनी मौन है।

सोमवार, 22 सितंबर 2008

कब तक ? आख़िर कब तक ?












कब तक ? आख़िर कब तक ?
लोग रहेंगे भयाक्रांत, जलता रहेगा हर प्रांत
फटते रहेंगे बम सड़कों चौराहों पर
" वे " हँसते रहेंगे हमारी आहों पर चलता रहेगा मौत का यह कुत्सित खेल
और हम होते रहेंगे अपनी योजनाओं में फेल
कब तक ? आख़िर कब तक ?
छूटता रहेगा अपनों का साथ
बच्चे होते रहेंगे अनाथ
उजड़ता रहेगा सुहागिनों के मांग का सिन्दूर
छिनते रहेंगे माँओं से आंखों के नूर
सरकार दावे पे दावे करती रहेगी
और मानवता सड़कों पे यूँही मरती रहेगी
कब तक ? आख़िर कब तक ?